Bibi-Ka-Makbara, Aurangabad

Aurangabad Caves, Aurangabad

Nasik Caves, Nasik

Ajanta Caves, Aurangabad

Ellora Caves, Aurangabad

Quila-I-Shakin, Daulatabad Fort, Aurangabad

अन्वेषणों 2010 तक के

गांव/क्षेत्र अवशेषों का स्वरुप
निमगांव निमोन पुर्वातिहासिक और मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन।
राजापूर मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन
सायखिंडा पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तन
सोनोशा मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन
वेल्ह ईसा पूर्व ११-१२ वी सदीं में निर्मित किलेनुमा और सिढीयोंवाला कुआ तथा मध्ययुगीन गणेश की स्वर्गीय प्रतिमा।


औरंगाबाद विभाग : परिचय

पुरातत्त्व अवशेषों का स्वरुप :

इस विभाग के श्री बी.पी. बोपर्डीकर ने अनुसंधानावादी में ‘चिचोंदी पाटिल’ नामक स्थान से नदी के अतल भाग से सुक्ष्म शीलाओं को प्राप्त कर उनका संग्रह किया।

बोपर्डीकर ने मुला नदी और उसकी एक उपनदी के किनारे बसे बारेगांव-नांदूर, तांदूरवाकी, धानोरा बुद्रुक व खुर्द और मानोरी रेणापूर से द्वितीय स्तर (series) की विशेषत: घिसने के साधनों की खोज की।

वाघोरे, ताभोरे, पाथ्रे-खुर्द, कामगार-बुद्रुक और कामगार खास आदि स्थानों से अनुसंधान के अंतर्गत श्री बोपर्डीकर को अश्मयुगीन साहित्य में चावूâ-छूरी और घिसने के साधन प्राप्त हुए।

जिला अनुसंधान के अंतर्गत राहूरी और पारनेर तालुका में संशोधन करते समय श्री बोपर्डीकर ने अश्मयुगीन सुक्ष्म-शीला और पूर्वेतिहासिक समय के विभिन्न स्थानों का संशोधन किया।

इस विभाग के एस.एल.राव को अनुसंधान के अवसर पर गोंदेगांव, जाफराबाद और उडणगाव में विष्णु, गणेश, ब्रह्मा, शिव-पार्वती, किर्ती-मुख ओर बैल दर्शानेवाली यादवयुगीन शिल्प प्रतिमाएँ प्राप्त हुई।

एम.आर.ढेकणे ने अपने खोज कार्य में उत्तर अश्मयुगीन मिट्टी के बर्तन तथा अनेक वस्तुएँ भोजाडे और रास्तापूर, शिणाडे आदि स्थानों से खोज निकाली। एस.एस. पारेख को खोज कार्य करते समय उत्तर मध्ययुगीन और मराठा युगीन पुराणवस्तुएँ प्राप्त हुए। उन्हें उत्तरमध्ययुगीन मंदिर और कुछ अवशेष कोपरगाव तालुके में सांगुरी वेलापूर तथा संगमनेर तालुके में चिचोली गुरव, काओटे, नलवंडे, पारेगाव, सुमनपूर और तीगांव में प्राप्त हुए।

एस़ एस़ पारेख को अपने अनुसंधान के अवसर पर औरंगाबाद विभाग के प्रत्येक गांव में उत्तर मध्ययुगीन अवशेष संगमनेर तालुके में कौठे कमलेश्वर, काकरगांव, कोंची, लाहोरे, नांजी, नीमगांव-जाग, निम्मन राजापूर और वेडगाव (पन) वाल्हे आदि स्थानों पर प्राप्त हुए।

औरंगाबाद विभाग के अंतर्गत किए गए सर्वेक्षण में एस.एस. पारेख को निम्न स्थान पर पुराणवस्तुएँ प्राप्त हुई -

गांव/क्षेत्र अवशेषों का स्वरुप
अश्वी (BD) दो मध्ययुगीन मंदिर - अमृतेश्वर शिव मंदिर और जहाँ विठ्ठल मूर्ति प्रतिष्ठिा है, वह विठोबा मंदिर। निवास के लिए नियोजित, पूर्वनियोजित की गई इमारत, ‘हरिलबाग’ तथा मराठायुगीन ‘हनिसवाडा’ जो बाजीराव पेशवा ने पूनप्रादी के बाद बनाया था।
कझार (kd) उत्तर मध्ययुगीन समय के शिव मंदिर का लिंग और नदी के किनारे पर स्थित भग्नावशेष ।
उमरी एकमुखी लिंगवाला संकटेश्वर के नाम से प्रख्यात उत्तरमध्ययुगीन शिवमंदिर।


अजित कुमार को अपने अनुसंधान में संगमनेर तालुके में निम्नांकित पुराणवस्तुओं के अवशेष प्राप्त हुए -

गांव/क्षेत्र अवशेषों का स्वरुप
धंधरफाल (खुर्द) १८ वीं शती का मंदिर यादगार खम्बे, १४-१५ वी शमी का नक्षी काम छोटा टिला और मिट्टी के बर्तन। उत्तर मध्ययुन मंदिर की शिल्पकृती।
गोलेवाडी छोटा टिला, पूर्वाेतिहासिक मिट्टी के बर्तन, इ.स. पूर्व १२-१३ वी सदी की ढिली हो चुकी नृत्यमुद्रा में शिव और नंदी की शिल्पकृति।
गुनीजवाडी मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन।
जावलेकाडलागे पूर्वातिहासिक और मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन।
क-हे मिट्टी के बर्तन
नांज ईसा पूर्व १८-१९ वी सदी के यादगार पत्थर, मिट्टी के बर्तन, मंदिर के भग्नावशेष, विष्णु और उमा माहेश्वर की दिली शिल्पाकृति।


गांव/क्षेत्र अवशेषों का स्वरुप
निमगांव निमोन पूर्वातिहासिक और मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन।
राजापूर मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन
सायखिंडी पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तन
सोनोशी मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन
वेल्हे ईसा पूर्व ११-१२ वीं सदी में निर्मित किलेनुमा और सिढीयोंवाला कुआ तथा मध्ययुगीन गणेश की स्वर्गीय प्रतिमा ।


तजापूर के जलमय विभाग के सिंचन प्रकल्प के अंतर्गत संशोधन करते समय इस विभाग के डी.एन. शिंदे को निम्न अवशेष प्राप्त हुए-

गांव/क्षेत्र अवशेषों स्वरुप
हनुमान टाकली १८-०१-१८७६ में रोमन साम्राज्य में मोडी लिपी का प्रचलन था। मुंबई राज्य परिषद के सचिव ने अपने शासकीय आदेश के अनुसार मोडी लिपी के प्रचलन को रोमन लिपी के समानांतर महत्त्व प्रदान किया। इसलिए मुंबई परिषद ने अपने अधिकार के अंतर्गत अधिकारों से एक मुहरबंद समझौता कर लिया। ब्रिटीश सरकार ने अपने साम्राज्य में मारुती मंदिर के लिए एक निश्चित राशी का वार्षिक अनुदान निश्चित और कायम किया गया।
जावखेड दुमाला मध्ययुगीन दिपमाला
जावखेड खालसा अर्वाच्ययुगीन किले की शिखाएँ । इसा की १३वी सदी के हेमाडपंथ के बरव। १९ वी सदी सदी की मोडी लिपी और चमडे की कव्हर पर किया गया चित्रकाम।
कोपरे मध्ययुगीन मिश्र धातू के बर्तन और बहुत बडे-बडे पत्थर ।
कासार पिंपरगांत मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन ।


अजित कुमार को संगमनेर तालुके के अनुसंधान में विभिन्न स्थानों पर प्राप्त पुरातत्त्व अवशेष -

गांव/क्षेत्र अवशेषों स्वरुप
औरंगपूर मिट्टी का टिला और बर्तन।
चिंचपूर ईसा की १८-१९ वीं सदी का मंदिर, नक्षी एवं नंदी का प्रतिमा।
कोंडू १८-१९ वीं सदी का कुआ तथा प्रवेशमार्ग।
मांडू मिट्टी के बर्तन
निबंगांव ईसा की १८-१९ वीं सदी का प्रवेशमार्ग
वडगांव पन शके १६९५ अर्थात ईसा के १७७३ में मोडी लिपी का नक्षी काम और मंदिर।


औरंगाबाद विभाग के डी.एन.सिम्हा के द्वारा किए गए अनुसंधान में-

गांव/क्षेत्र अवशेषों स्वरुप
अंभोरे मराठायुगीन शिव-मंदिर व देवी मंदिर।
जामगांव मध्यामयुगीन साहित्य।पूर्वातिहासिक युगीन मिट्टी का टिला । मिश्र धातुकी व मिट्टी के बर्तन ।
जोरवे अश्मयुगीन मिट्टी के बर्तन और मध्ययुगीन मंदिर।
कहाकपूर/कानोल उत्तर मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन
कोलवाडा उत्तर मध्ययुगीन छोटे-छोटे तीन मंदिर।
नागपूर उत्तर मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन
ओझार बक उत्तर मध्ययुगीन मंदिर जहाँ नंदी और शिवलिंग का जिर्न शिल्प है ।
पिंपराने मराठायुगीन मंदिर, हवेलियाँ, शिवलिंग और नंदी की शिल्पकृती।
हिवरगांव-पावसा अ. ईसा की १८ वीं सदी का छोटास महादेव मंदिर। ब. १८ वीं सदी का खंडोबा मंदिर क. १८ वीं सी का मोड पर्वत के दुसरे छोर पर स्टिन खंडोबा मंदिर।
खराड उत्तर मध्यकालीन मिट्टी के ऐसे बर्तन जो काफी कम स्थानों पर प्राप्त होते है- थाली, कटोरा आदि है। इन में कुछ चिनी मिट्टी और काली मिट्टी में बनाए गए है।
निम्भाले ईसा १८ वीं सदी में प्राप्त मस्जिद जिसके परिवेश में कबर बनाए हुए हैं।
रयतवाडी चिनी मिट्टी के बर्तन
शिरपूर उत्तर मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन लाल और काली मिट्टी के बर्तन।
वाघापूर जीर्व नंदी, शिवलिंग और चौनार के पत्थर पत्थर में बनाया हुआ बैल का चेहरा और उसमें से ही बाहर जाने का मार्ग।
चंदनपूरी १९ वीं सदी की चार पुरानी हवेलियाँ। उत्तर मध्युगीन लिंगपीठवाला शिवमंदिर।
सावरगांव ताल दोे पुराने खंडव, जहाँ लाल काली और चिनी मिट्टी के अधिकृत
झोल उत्तर मध्ययुगीन लिंगपीठवाला शिवमंदिर और जीव गणेश शिल्प। मंदिर के सामने नंदी शिल्प एवं १८ वीं सदी का गणेश मंदिर।


भारतीय पुरातत्त्व विभाग विद्वान अधिकारा व्हि.डी. जाधव, व्ही.एन. प्रभाकर, वसंतकुमार स्वर्णकार और ए.के. तुरे इन्होनें गोदावरी नदि के किनारे दिअंबाद के उत्त्र हडप्पायुगीन खनन कार्य में प्राप्त स्थानों के नजदिक निवास स्थानों विभाजन पद्धती को खोज निकाला वे स्थान निम्न है -

गांव/क्षेत्र अवशेषों का स्वरुप
नेवासा िfमट्टी के बर्तन, छोटी मुर्तियाँ साज्fाव गुफाएँ, जीव शिल्पावशेष, जिसमें ११,१२ वीं सदी की जानकारी प्राप्त होती है।
खाडले परमाई ता. नेवासा निवासस्थानों की जगह, मध्ययुगीन खम्बे के कुछ भग्नावेशष।
माळुंजे (खुर्द) ता श्रीरामपूर १२ वीं सदी का विठ्ठल रुक्मणी का मंदिर और शिल्प ।
लाड गांव ता श्रीरामपूर १२ वीं सदी के शुशोभित किए गए खम्बे के अवशेष और शिल्प।
पिंगळवाडी राहता इस गाँव के नजदिक मध्ययुगीन बस्ती का स्थान प्राप्त हुआ।
रांजनगांव राहता मराठायुगीन लकडी का प्रवेशद्वार और हवेलियाँ
वाकडी राहता छोटा टिला जो मध्ययुग में बस्ती के रुप में स्थित था।
जलगांव राहता ईसा की ११-१२ वी सदी के महादेव मंदिर के पास रखे गए दुर्गां विष्णू और शिव के शिल्प।
गोंदेगांव (ता श्रीरामपूर) आधुनिक मंदिर के पास ११-१२ वीं सदी के नंदी दुर्गा व शिव के शिल्प।
कमलपूर महानुभाव पंथ का मंदिर जो अहिल्याबाई होलकर ने बंधवाया ऐसा कहा जाता है।
भोकर महाकाली वडगांव १२ वीं सदी का महादेव मंदिर शिल्पकृति, खम्बे और सभागृह और ईसा की १०वी -१२ वीं सदी में निर्मीत उत्तर की और की निवासी बस्ती जहाँ छोटा टिला है।
एकरुके उत्तर मध्ययुगीन जीर्ण प्रवेशद्वार, किले के पास सिढ़ींयौवाला कुआ।
खानापूर मध्ययुगीन छोटा टिला और शिल्प तथा १० वीं १२ वीं सदी के हनुमान मंदिर के पास की गणेश शिल्प प्रतिमा, भिक्षुक शिव आदि शिल्प।
भामठाण पुनतांबा मध्ययुगीन बस्तीवाला छोटा टिाला । गणेश व लक्ष्मीनारायण का शिल्प। कार्तिकस्वामी और लक्ष्मीनारायण मंदिर के प्रवेशद्वार पर किया गया नक्षीकाम मराठायुगीन गाँव के बाहर बनायी हुई सुरक्षा दिवार। प्रवेशद्वार के पास खडी पुरानी हवेली।
मादुळठाण मध्ययुगीन बस्ती का टिला तथा सूरक्षातट।
नायगव्हाण `गढ़ी’ के नाम से संबोधा जानेवाला बस्तीस्थान मध्ययुगीन चिनी मिट्टी के बर्तन और गाँव की उत्तरी भाग में नदी के किनारे पर स्थित कुआ।
सोमगवे राहता ईसा की १२ वी सदी की लक्ष्मी नारायण, लक्ष्मी, शिव व गणेश की शिल्पकृति।
वस्तापूर राहता पिंपळगांव- राहता मध्ययुगीन बस्ती का टिला। उत्तर मध्ययुगीन छोटी सुरक्षा दिवार प्रवेशद्वार सिढ़ीयों का कुआ।


औरंगाबाद विभाग के अजित कुमार को बेंबला नदि के प्रकल्प में जलातर्गत संशोधन करते समय पूर्वानिशासिक मध्ययुगीन अवशेष अमरावती जिले के, चांदुर तालुके में धाम का और गायखेड इन स्थानों पर प्राप्त हुए।

अचलपूर तालुके की शहानुर नदि प्रकल्प के जलांतर्गत संशोधन के अवसर पर अजित कुमारजी को मोरगड और बडगांव में भी कुछ पुर्वातिशसिक मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए।

वानोजा ता पानी वानोजादेवाी के नाम से प्रख्यात मध्ययुगीन मंदिर यहाँ खम्बों का द्वार मंडप तथा समाधि है। मंदिर के शिखर अंश का नुतनीकरण किया गया। इसे स्थानिक लोगों में सपेâद रंग दिया ।
चिकनी ता- वारोरा ईसा की १७ वीं सदी में बिठ्ठल-रुख्माई और हनुमान मंदिर प्राप्त हुए ।
वाघनाका ता वरोरा शिव समर्पित हेमाडपंथीय मंदिर के अवशेष जिसमें जनानखना और खम्बों से निर्मित द्वारा मंडप है।
खरवाड ता वरारा १२ वी -१२वीं सदी का हेमाडपंथी शिवमंदिर
वमपूर ता मूळ वाघा मध्ययुगीन छोटे शिवमंदिर के अवशेष तथा नियोजनपूर्वक बनया गया सभामंडप, अंतराल और पवित्र समाधि। बालाजी मंदिर और विष्णुमंदिर के अवशेष प्राप्त हुए। यह मंदिर १७ वीं सदी के होने की संभावना है।


विभाग के श्री एस. बी. देव और श्री झेड.ए. अन्सारी अन्हें अनुसंधान के अवसर पर कुकर मुंडे इस स्थान पर कुछ खाली गोल साधन प्राप्त हुए जो सुर्यकांतमाते, गोमेद और कुछ मात्रा में चमकिले रेत के पत्थरों से बनी हुए थे।

पश्चिम खान्देश जिले में एकलाहोर इस स्थान कुल्हाडी और कुछ बडे बडे धुरे प्राप्त हुए जो उत्त्र अश्मयुगीन थे। इसी जिले के कोंडीवाडे स्थान पर श्री बी.बी. लाल को अश्मयुगीन और उत्तर अश्मयुगीन औजार प्राप्त हुए।

विभाग के श्री एस.एस.साली को अपने संशोधन कार्य के समय तापी नदी के किनारे और उसकी उपनदीयों के किनारे कुल्हाडी और कुछ धुरे प्राप्त हुए।

वुंâभार पाडा और उमाज के बीच तापी नदी की उपनदियाँ रंका और नाला के सर्वेक्षण में श्री एस.ए. साली ने क्रमबद्धता से पत्थर के कारखाने को भी प्रस्तुत किया।

संशोधन के अवसर पर श्री एस.ए. सालीजी को भाडने नामका स्थान से कुछ पुर्वाश्मयुगीन साहित्य प्राप्त हुआ। परोजपूर के पास चांदवेल नामक स्थान से कुछ प्राचीन निवासस्थान धुलियाँ जिले के ईर्द गिर्द प्राप्त हुए।

एस. के. शाली ने साक्री तालुके में अपने संशोधन के अवसर पर पंजारा नदी पर म्हासडी में उँचे टिले का अंश तथा रेत के नीचे मध्याश्मयुगीन गोमेदवाली तलवार प्राप्त हुई। उत्तर मध्य अश्मयुगीन स्थान जिनमें धानार, गणेशपूर, नीलगवान यहाँ औजारों का खजाना प्राप्त हुआ साथ ही यहाँ सुर्यकांत मादीयों का ढलया इसी प्रकार का साहित्य दारखेड, देहाने, काकनपाडा, नीलगवान, प्रतापूर, उभारती , उभरे आदि स्थानों पर भी प्राप्त हुआ। चिंचखेड, दारखेड, नडसो आदि स्थानों पर अश्मयुगीन बाहड, चैल, गणेशपूर, प्रतापूर यहाँ सन् १२-१३ के भग्न मंदिर है। पर पंजारा में उँचे ओहदे को अपने संशोधन में धातरर्ति स्था लाल बेसाल्ट से निर्मित प्राचीन साधी कुल्हाडी। चार दी, आरोडोना, इसारदा, वंâधार और अन्य स्थानों से भी विभागने अनेक साधन प्राप्त किए। बलसाना, दुसाना, वंâधा, रुवमाली, रहदनगर, सालमना, वेहरगाव यहाँ अश्मयुयगीन निवासस्थान प्राप्त हुए। १३ वीं-१४वीं सदी सें संबंधित मंदिर के भगनावशेष सिढिओं वाला कुआ पथरिला स्मारक, शिल्प, चौपाल, दुसाना, शेरदाना, रंदवा, वंâधा, वादिल और वेहेगाव में प्राप्त हुए तथा मुघल, मराठायुगीन सुरक्षा दिवार के अवशेष और अन्य रचना दोमकानी मोरदाना वोहरगांव आदि स्थानों पर प्राप्त हुए।

एस.ए. साली को रायपूर भाडगांव स्थानपर जोती हुई तथा खुदी हुई जमीन दिखाई दी । उन्हे पूर्वाश्मयुगीन प्रतिलिधित्व करनेवाले आधार डझन साधन प्राप्त हुए जिनमें कालवधरी पत्थर और बडी छुरी महत्त्वपूर्ण है। मध्ययुगीन सुयकांतमाळी, उत्तराश्मयुगीन सुर्यकांतमाळी, चमकिले पत्थर का टुटा हुआ टुकडा निशन पडा हुआ मध्यांश धरवाले पत्ते का भाग घिसने का स्थान और स्मशानभूमि। उत्तराश्मयुगीन प्रतिनिधित्व करनेवाला मुख्यत:

चमकिले रेत के पत्थर थे। साली को मुहंजी पाडा में संचित कीचड के स्तर प्राप्त हुए। यहाँ उत्तराश्मयुगीन एक घनाकार पत्थर जो मध्यभाग में थोडा कुला और तुम जेसा प्रतित हो रहा था। साली ने अपने संशोधन के लिए वनस्पति तथा प्राणियों का अध्यायन करने हेतु उचित स्थान का चयन किया।

विभाग के एस.आर. राव पुनर्परिक्षण करते समय तापी नदी की खाई में, उत्तर सावळदा स्थान में संबंधित लाल और पिले रंग की कुछ वस्तुएँ प्राप्त हुई।

एस.ए.साली ने सर्वेक्षण के अवसर पर अनेक स्थानों की खोज की बोराडी शिरपूर तालुका अंबडनुल्ला के किनारे यह स्थान बसे है। कुछ प्राचीन स्थान, जैसे सारगखेड शहादा तालुका तापी नदी के दाये किनारे पर थे। बाजू में ही नरम पत्थर कुछ निशानवाले अंश मिट्टी के बर्तन सावनदा बर्तन उत्तर इरापत बर्तन, काले और राचवाले बर्तन मुलम्मा दिए - ---बर्तन बडे, मोटे जिसपर नक्षीकाम किया गया है।

विभाग के व्ही.एल. धारुरकर सिंदखेड तालुवेंâ में उत्तर इरप्पदुगीन बर्तन, शेवराब्ली, बार्सुस, बालखेडा आदि स्थानों की खो़ज, पैâली हुआ टिला, औद्धें में प्राचीन व अश्मयुगीन बर्तन उसपर तांबे की मुर्तीया,पात, शंखद्वारा बनात गए वंâगन के टुकडे, जिसपर हरपानयुगीन लिपी में कछ लिखा गया है। धारुरकरजी को सिंदखेड तालुके में अपने संशोधन के अवसर पर अच्ची, अकदोसा, अरावे धोडाईचा, पिंपरी और वारळे इन स्थानों से कुछ अश्मयुगीन साधन प्राप्त हुए।

विभाग के एस.एन. रघुनाथ और एल.एस. राव को अपने अनुसंधानावसर पर मेथी नामक गांव से उत्तर हरप्पा युगीन और मालवायुगीन चित्रकला से संबंधित टुकडे प्राप्त कप्पोंवाला गोमेद, चमकिले पत्थर के अंश प्राप्त हुए। अलारा में उत्तर हरप्पायुगीन नकीले भाले जैसे तेज धारवाले हत्यार, गोमेद, चमकिले पत्थरों से बनाया गया। कुरळावाडा स्थान पर राव को जोरवे अंश दिखाई दिया जिसमें सुर्यकांतमाणी और चमकिले पत्थर का मध्यांश : और विविध साधनों के पत्ते दृष्टिाोचर हुए। राव ने अपने अनुसंधनावरुर पर बुद्रुक गाँव में लाल और काले पत्थरो पर स्थित है। यहाँ के खालज नामक स्थान में ऐतिहासिक स्थान प्राप्त हुए। तापी नदी के बायें किनारे पर लाल और काले रंग के बर्तन प्राप्त हुए।

अजित कुमारजी को सिंचाई प्रकल्प के कारण पुरातत्त्व की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुए।

जिला तालुका गाव/क्षेत्र अवशेष
धुलिया नंदुरबार भद्रपाडा पूर्वातिहासिक व मध्ययुगीन टिले पर प्राप्त मिट्टी के बर्तन
धुलिया शहदा वाडनांव पूर्वातिहासिक व मध्ययुगीन टिले पर प्राप्त मिट्टी के बर्तन
धुलिया शहदा वाडनांव ऐतिहासिक और मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन
धुलिया सिंदखेड वाडी पत्थर, ईटों की सुरजा दिवार हत्रुार, टिला और मिट्टी के बर्तन


पी.सी. चौधरी, व्ही.डी. जाधव, डी.टी. असार इन्होंने हिंगोली सीन हिंगोना खुर्द और वार्सुस यहाँ संशोधन किया। इन स्थानों का पहले ही ऐतिहासिक स्थानो के रुप में घोषित किया गया था। यहाँ मिट्टी के बर्तन भारी मात्रा में थे। वार्सुस में ५०० मी ² ५०० मी. लंबाईवाली बडी पहाडी प्राप्त हुई। तापी नदी की उपनदी बुरी के बाये किनारे पर यह पहाडी स्थित है। यहाँ प्राप्त मिट्टी के बर्तन पूर्वातिहासिक युगीन प्रतित होते है।

विभाग के एस.एन रघुनाथ ने मुळ तालुकेकी वैनगंगा नदी के नजदीक भमेश्वरसा गाँव में ऐतिहासिक थानों की खोज की।

अजित कुमार को अपने अनुसंधान में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुए-

जिला तालुका गाव/क्षेत्र अवशेष
जलगाँव चोपडा मलकापूर प्राचीन टिला, मिट्टी सुरक्षा दिवार, मिट्टी के बर्तन


औरंगाबाद विभाग व्ही.डी. जाधव को नागपूर जिले में अपने जलांतर्गत संशोधन में निम्न स्थान प्राप्त हुए-

जिला तालुका गाव/क्षेत्र अवशेष
औरंगाबाद हिका उमरेर तुरातोंडी हेरवा धारवाला पत्रा, भाला और अन्य हत्यार भाला, निशान पडा हुआ तेज धारवाला पत्ता ।
नारखेड पिंपळगांव तेज धारवाला पत्ता और अन्य हत्यार।


विभाग के अजितकुमार को ऐतिहासिक साधनों के अवशेष प्राप्त हुए। श्री एम. महादेवा को निम्न स्थानो पर अवशेष प्राप्त हुए

नांदेड किनवट भामपूर मध्य ऐतिहासिक साधन
नांदेड किनवट चिंचवड मध्य ऐतिहासिक साधन
नांदेड किनवट सेभाला मध्य ऐतिहासिक साधन
नांदेड किनवट सवीगडा मध्य ऐतिहासिक साधन
नाशिक नाशिक ढाबरगांव पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तनवाला टिला
नाशिक नाशिक धांडेगांव पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तनवाला टिला
नाशिक नाशिक दहिगांव पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तनवाला टिला
नाशिक नाशिक जावडा पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तनवाला टिला
नाशिक नाशिक निकवाटे पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तनवाला टिला
नाशिक नाशिक पिंपळवाडी पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तनवाला टिला
नाशिक नाशिक सदागांव पूर्वातिहासिक मिट्टी के बर्तनवाला टिला


विभाग के एस.एन. रघुनाथ के समस्या उद्बोधन संशोधन के अवसर पर मालखेड नामक स्थान पर ऐतिहासिक मिट्टी के बर्तन और भिमा नदी की खाई में वुंâचुर स्थान पर उत्तराश्मयुगीन साधन प्राप्त हुए। विभाग के श्री एम.आर. ढेकणे को जलांतर्गत अनुसंधानावसर पर उमरगा तालुके में तेरणा प्रकल्प में मांडपंथीय मंदिर दृष्टिाोचर हुआ। इसमे सभा मंडप, सभागृह, समाधि और जनानखाना भी प्राप्त हुआ। यह मंदिर ईसा की १३ वीं सदी का अर्थात यादवयुगीन है शिवमंदिर है। यह मंदिर पूर्वमुखी है।

औरंगाबाद विभाग के डी.एन. सिन्हा में जलांतर्गत संशोधन में डिडोरा बेहर प्रकल्प में इ.स. १३-१४ वीं सदी का हेमाडपंथी मंदिर के भग्नवशेष प्राप्त हुुए और मध्ययुगीन मिट्टी के बर्तन हिंगनघाट में प्राप्त हुए। अजित कुमार को भी ऐतिहासिक और मध्ययुगीन अवशेष्ज्ञ डिगही खानपूर, फत्तेपूर, कोपरा, कुरहिगांव, पहुर, पलोटी, पिंपळखुटा और सावंगा आदि स्थानों पर प्राप्त हुआ।

औरंगाबाद विभाग के एम. महादेव को पेनगंगा प्रकल्प पर पुरात्त्व अवशेष दृष्टिााचर हुए-

जिला तालुका गाव/क्षेत्र अवशेष
यवतमाल हाटांजी आर्हता ८-१० फिट के मोटापावाला किचड को स्तरोवाला गाँव, महापूर के कारण यह कीचड संचित हुआ और उसी कीचड पर ग्रामीण बस्ती विकसित हुई। टूटे हुए रुप में गणेश मुर्ती, सुंदर सती प्रतिमा , जो १६वीं सदी में संबंधित है।
यवतमाल हाटांजी बिलायत मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल हाटांजी चिमटा मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल हाटांजी गुडा सिद्धेश्वर के नाम से प्रख्यात १९५७ में निर्मित आधुनिक मंदिर।
यवतमाल हाटांजी घोटी गाँव का टिला, जहाँ खुले खम्बों का मंडप है, लिंगा और भग्नावस्था में शिल्प रखे हुए हैं। इस मंडप में १६ खम्बे लगे हुए है । यहाँ १८ वीं सदी में निर्मित बडा है।
यवतमाल हाटांजी केलापूर १८ वी सदी का वैâलेश्वर मंदिर/श्विमंदिर जो गाँव की दक्षिण दिशा में स्थित है।
यवतमाल हाटांजी खडका/खडकों १८ वीं सदी की इमारत तथा बिटिश और मोगलयुगीन सिक्के प्राप्त हुए।
यवतमाल हाटांजी काप भगवान शिवजी का कपिलेश्वर मंदिर, इसमें मध्यगृह और सभागृह है। यह मंदिर उँचें टिलेपर बनाया गया।


मंदिर के द्वार पर गणेशाकृति निर्मित की गई है। सभागृह की दिवारों पर नक्षीकाम किया गया है। मंडप में १८ खम्बे लगे है, मंदिर के बीच बैल रखा है। यह मंदिर शायद १७ वीं सदी का है। मंदिर की खास देखभाल की गई है। १८ वीं सदी की निवासयोग्य इमारत भी यहाँ पायी गई।

जिला तालुका गाव/क्षेत्र अवशेष
यवतमाल घटांजी कवढा (बक) मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी कवढा (खुर्द) मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी कपेस्वार मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी मनुष्यदरी मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी रत्नापूर मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी सावली-साबोड मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी उमरी मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी विरुळ मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी वरुडा मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी झारी मध्याश्मयुगीन साधन
यवतमाल घटांजी झापरवाडी मध्याश्मयुगीन साधन


औरंगाबाद विभाग के सिन्हाजी को जलांतर्गत संशाोधन में बेबला नदी पर किए गए जैवशास्त्रीय प्रकल्पांतर्गत निम्न अवशेष प्राप्त हुए -

जिला तालुका गाव/क्षेत्र अवशेष
यवतमाल बाभुलगांव दाभा उत्तरमध्ययुगीन मिट्टी का किला
यवतमाल बाभुलगांव पाथुर इसा की १२ वी सदी में जीर्वावस्था में सुंदर विषणु मुर्ती का केशव मंदिर
यवतमाल बाभूलगांव पिंपलखुया उत्तर यादवयुगीन मडगळलेश्वर मंदिर


औरंगाबाद विभाग के ढेकने को अपने सर्वेक्षण के अंतर्गत बौद्ध, हिंदु और जैन मंदिर को अवशेष प्राप्त हुए-

जिला तालुका गाव/क्षेत्र अवशेष
मुंगोळी वनी ईसा की १८ वी संदी के दो मंदिर प्राप्त हुए, जिनमें एक संतों का तो दुसरा हनुमान का है।
झुडगा वनी मध्ययुगीन मंदिर के अवशेष जहाँ सभामंडप और पवित्र समाधि है। मंडप को पेड पौधों और पुâलों तथा नक्षी काम से सजाया गया है।


श्री एल.के. श्री निवासन को चंद्रपूर जिले में पहिले दर्जे और दुसरे दर्जे की सुक्ष्म शीला और काला चवाकिला रंगवाले टुकडे बेगरम में प्राप्त हुए दुसरे दर्जे के साधन और हत्यार शिरांचा में और कुछ पथरिले गोलाकार चकलापेट में प्राप्त हुए। उन्होंने वाघेडा और शरदपुर में अश्मयुगीन स्थानों की भी खोज की। यहाँ उन्हें पूरी याँ, चिकने पत्थर की मुङ्गवाली कल्हाडी, अन्य औजार प्राप्त हुए। उन्हें वर्धा में वैनगंगा नदी के वुंâड में अनेक स्थानों की जानकारी प्राप्त हुई। इनमें पापामीयाँ टिला और झरी मंगरुळ यह दोनों स्थान पत्थर के बडे हत्यारों से लेकर पत्थरों के सुक्ष्म हत्यार बनाने माहिर थे। उन्हें अपने संशोधन में चंद्रपूर नगर के पूर्ण दिशा में झारपाट नदी की खाई में एकीकरण कीए हुए पत्थर के हत्यार और तेजधारवाले शस्त्र निर्मिती करनेवाले कारखानों के नमुने दृष्टिगोचर हुए। श्रीनिवासन को अपने संशोधनवरुर पर मध्याश्मयुगीन साधन तहसील वारोरा में लोणार पर श्रेष्ठ कांचमणि द्वारा बनायी गए वस्तुएँ प्राप्त हुई।

एल.के. शर्मा और डी. हनुमान्थाराव को नुल्लाह नदी के किनारे पर रामडिगी में सुक्ष्म साधनों के कारखानों की खोज की। सिरांचा तालुके में जलांतर्गत संशोधन में इंचमपल्ली प्रकल्प में डी. हनुमानथराव ने मध्ययुगीन मंदिर, शिल्प और रचनाओं समावेश किया जा सकात है, ऐसा संशोधन किया। विभाग के जी के माने जी. ने ब्रह्मपूरी तालुके में संशोधन के अवसर पर उँचे टिलेपर १० मीटर पैâले हुए क्षेत्र में करिबल १०० पत्थरों की कबर बनायी हुई, खोज निकाली, यहाँ कुछ लाल और काले रंग की वस्तुएँ भी प्राप्त हुई। यहाँ के निवासस्थान सातवाहन युगीन थे। यहाँ दिवारों की निर्मिती के लिए ईटों का उपयोग हुआ । एस.एन. रघुनाथजी को उँचे पर्वत की ढलान पर और प्रापाईता तथा बमरगाह नदी के उपर के भाग में सिरांचा तालुके में उत्तराश्मयुगीन धंदो के कारखानों के स्थान प्राप्त हुए।

औरंगाबाद विभाग के एम.आर. ढेकने को बौद्ध, हिंदू और जैन मंदिरो के अवशेष प्राप्त हुए-

भद्रवती जिलें का बौद्ध, हिंदू, जैन मंदिर गणेश,ब्रह्मा, विष्णु, बरुण और कुबेर मुर्ति और मध्य युगीन शिवमंदिर, गाँव की पश्चिम दिशा में कुछ जैन मंदिर प्राप्त हुए।
घोट नाम्बाला ईसा की ११-१२ वी सदी का मध्ययुगीन हिंदू मंदिर जिसमें भग्र ग्रर्भगृह, अंतराल और मंडप है। मंदिर के नजदिक सपा माद्धिाका तावदान शिल्प जो सिला हो चुका है।
घंटा चौकी मध्ययुगीन हेमाडपंथी शैली का मंदिर प्राप्त हुआ।
सोमठाणा पूर्व मध्ययुगीन पुराने समाधि मंदिर के अवशेष जिसमें सिर्पâ द्वार मंडप ही ठिक- ठाक था ।
चंदनख्ोडा ता भद्रावती ढिली शेचकी गणेश, हनुमान, मराई, महिबासुरमर्दिनी, इरागौरी और विष्णू आदि शिल्प।
धानोरा पिंपरी ता भद्रवती दो मध्ययुगीन मंदिर- एक विष्णु आ ैर दुसरा शिवमंदिर
मानोवा ता भद्रावाती गणेश मुर्ति के टुकडे दुरागौरी और शिवलिंग का अप्रतिम शिल्प।


सहय्यक पुराणवस्तु संशोधक डॉ. मनोज कुमारकुर्णी के बुलढाणा जिले के जीगांव सिंचाई प्रकल्प में जलसमाधिस्त २३ गाँवो का अनुसंधान किया-

अ.व्र गाँव अक्षवृत्त/ रेखावृत तालुका नदीका दाया/बाया किनारा अवशेष
१. येरली २००५६’ ५३’’ उत्तर ७६०२७’ ५१’’ पूर्व नांदूरा पूर्णा नदी के बाये किनारे पर बसा हुआ है। ज्ञानगंगा और पूर्णा नदी के संगम पर स्थित संगमेश्वर मंदिर। यह मंदिर पूर्वमुखी है। उत्तरयुगीन विठ्ठल रुक्मीणी की मुर्ति भी भीतर स्थापित है।
२. भेलाड २००५१’ ४०’’ उत्तर ७६०३१’ ५५’’ पूर्व नांदूरा ----//---- पिंपलेश्वर को समर्पित पवित्र अवशेषों की मुख्य समाधि।
३. मानेगांव २००५६’ ४०’’ उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- हनुमान मंदिर के साथ ही एक नया पुनर्वसित गाँव ।
४. जाडगांव २००५६’ ५०’’ उत्तर ७६०२७’ ५४’’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- कुछ मात्रा में पानी के नीचे गया गाँव
५. हिंगणा (नवेगाव) २००५६’ उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- हनुमान मंदिर
६. तिवडी (आजमपूर) २००५६’ उत्तर ७६०२३’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- यहाँ धनगर जाति का पिरावा मंदिर और पारधी जाती का माऊली देवी मंदिर है।
७. आडोळ (बुद्रुक) २००२७’ ४४’’उत्तर ७६०२३’ ०३’’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- मारुती मंदिर और दत्त मंदिर
८. अडोल (खुर्द) - जलगांव (जामोद) ----//---- मारोती मंदिर
९. पानतोंडा २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- दो ताले का मंदिर। निचले ताले पर बिठ्ठल-रुक्खमणी मंदिर। ऊपर के ताले पर हनुमान मंदिर है।
१०. पळसोडा २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- गNही व महादेव और हनुमान मंदिर।
११. हिंगण (गव्हाड) २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- सोनाजी समाधि मंदिर
१२. टाकली (वाटपाल) २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- ३६ चंदन के खम्बों की सीमा में बिस्तारित शिवमंदिर।
१३. जीगांव २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- जीर्णावस्था में महादेव मंदिर हनुमान और गजानन
१४. हिगणा (बाळापूर) २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- विठ्ठल रुक्माई मंदिर
१५. गोळेगांव २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- रेणुकादेवी और हनुमान मंदिर
१६. टाकळी (पारसकर) २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- हनुमान मंदिर
१७. टाकली (खास) २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- मरी माता मंदिर
१८. गोलेगाव (खुर्द) २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) ----//---- महादेव मंदिर
१९. शाटली २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व जलगांव (जामोद) पत्रा उल्हासी नदी शिवलिंग, हनुमान मंदिर, विठ्ठल-रुक्माई मंदिर
२०. आलमपूर २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा पूर्णा नदि के बाये किनारे पर हनुमान मंदिर और कुछेका मात्रा में पानी के नीचे गप्त गाँव
२१. मामुलवाडी २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- हनुमान मंदिर
२२. खारवुंâडी २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- मरी माता मंदिर, भाकरी मता इस प्राकृतिक टिले पर सात पैâल हुए पत्थर
२३. कोदरखेड २००५६’उत्तर ७६०२७’ पूर्व नांदूरा ----//---- खुले मैदानपर स्थित हनुमान मंदिर